छल, कपट और पाप - उतना ही करो, जितना भुगत सको
हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा किया हुआ छुप जाएगा। कोई देख नहीं रहा, कोई सुन नहीं रहा, तो हम बच जाएंगे। पर सच यही है कि इंसान की अदालत से भले ही बच जाओ, कर्म की अदालत से कोई नहीं बचता।
1. छल, कपट और पाप हैं क्या?
ये तीनों एक ही बीज के तीन रूप हैं।
छल - जब हम सामने कुछ और होते हैं और पीठ पीछे कुछ और। किसी को धोखे में रखकर अपना काम निकालना।
कपट - जब मन में मैल हो और जुबान पर मिठास। कपटी आदमी कभी जोर से वार नहीं करता, वो धीरे-धीरे भरोसा तोड़ता है।
पाप - जब हम जानते हुए भी कि ये गलत है, सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे को दुख देते हैं।
तीनों का मूल एक ही है - स्वार्थ। हमें लगता है कि थोड़ा सा छल कर लेंगे तो क्या होगा, थोड़ा झूठ बोल लेंगे तो क्या होगा। पर यही थोड़ा-थोड़ा एक दिन पहाड़ बन जाता है।
2. इंसान भूल जाता है, कर्म नहीं भूलता
हमारा हिसाब-किताब कमजोर हो सकता है, पर प्रकृति का हिसाब पक्का है।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है -
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
तुम कर्म करने के लिए स्वतंत्र हो, पर फल से नहीं बच सकते।
आप किसी को धोखा देकर आज जीत सकते हो। किसी का हक मारकर आज अमीर बन सकते हो। पर याद रखो, जो बीज आप बो रहे हो, फसल भी आपको ही काटनी है।
कई बार फल तुरंत नहीं मिलता। इसीलिए लोगों को भ्रम हो जाता है कि कर्म का सिद्धांत झूठा है। पर कर्म गेहूं की फसल नहीं, आम का पेड़ है। बोने में समय लगता है, पर जब फल आता है तो अकेला नहीं आता।
जो व्यक्ति छल करता है, उसे जीवन भर एक और सजा मिलती है - वो कभी किसी पर भरोसा नहीं कर पाता। क्योंकि उसे लगता है जैसे वो सबको धोखा दे रहा है, वैसे ही सब उसे धोखा दे रहे हैं।
3. शक्ति से ज्यादा पाप क्यों नहीं करना चाहिए?
उतना ही करना चाहिए जितना भुगतने की शक्ति हो।
क्योंकि भुगतना तो पड़ेगा ही।
जब कर्म लौटकर आता है, तो ब्याज के साथ आता है। आपने किसी को एक आंसू दिया होगा, आपको सौ आंसू रोने पड़ेंगे। आपने किसी का दिल तोड़ा होगा, आपका दिल हजार बार टूटेगा।
उस समय आप भगवान को दोष दोगे, किस्मत को दोष दोगे, लोगों को दोष दोगे। पर सच ये होगा कि वो आपके ही किए हुए कर्मों का लौटा हुआ रूप होगा।
इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति पाप करने से पहले एक ही सवाल पूछता है - क्या मैं इसके लौटने पर इसे सह पाऊंगा? अगर जवाब नहीं है, तो कदम पीछे खींच लेना ही धर्म है।
4. तो फिर करना क्या चाहिए?
छल, कपट और पाप से बचने का मतलब ये नहीं कि आप सीधे-सादे बनकर दुनिया से लुटते रहो। इसका मतलब है -
होश में रहो। हर कर्म करने से पहले एक पल रुककर सोचो, क्या मैं ये कर्म देखे जाने पर भी कर पाऊंगा?
नियत साफ रखो। व्यापार करो, खूब कमाओ, तरक्की करो, पर किसी की मजबूरी का फायदा उठाकर नहीं। किसी की पीठ पर पांव रखकर चढ़ी हुई ऊंचाई ज्यादा दिन टिकती नहीं।
हिसाब आज ही साफ रखो। अगर किसी का दिल दुखाया है, तो माफी मांग लो। अगर किसी का हक लिया है, तो लौटा दो। कर्म का कर्ज जितना पुराना होता है, उतना भारी होता है।
अंत में एक ही बात है -
छल से बनी इमारतें बहुत ऊंची लगती हैं, पर उनकी नींव खोखली होती है।
और सच से बना झोपड़ा छोटा जरूर लगता है, पर उसमें नींद बहुत गहरी आती है।
इसलिए पाप से डरो मत, पाप के फल से डरने की तैयारी रखो। क्योंकि कर्म किसी को नहीं छोड़ता, न राजा को, न रंक को।
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