जब शादी हो जाती है, तो रिश्तों का तराजू बदल जाता है...
सास-साली और माँ-बहन - एक कड़वा सच
शादी के बाद एक नया संसार बसता है। नए रिश्ते, नई जिम्मेदारियां, नई उम्मीदें।
और इस नए संसार में अक्सर एक अजीब सा बदलाव देखने को मिलता है।
खुशी के मौके पर, त्योहार पर, किसी फंक्शन पर, घर में किसी खास दावत पर - सबसे पहले याद आती है ससुराल की।
सासू माँ के लिए साड़ी, साली के लिए गिफ्ट, ससुर जी के लिए मिठाई। फोटो में सबसे आगे वही रखे जाते हैं, स्टेटस पर वही दिखाए जाते हैं। क्योंकि समाज को दिखाना होता है कि देखो हम कितना ख्याल रखते हैं।
और इस दिखावे की दौड़ में कहीं पीछे छूट जाते हैं वो अपने...
वो माँ जो बिना कहे तुम्हारी भूख समझ जाती थी।
वो बाप जो तुम्हारी एक छोटी सी ख्वाहिश के लिए अपनी जरूरतें भूल जाता था।
वो भाई जो बिना मतलब के तुम्हारी लड़ाई अपने सिर ले लेता था।
वो बहन जो तुम्हारे दुख में छुप-छुप कर रो लेती थी।
उनके लिए हमारे पास समय नहीं होता। फोन पर एक छोटी सी बात - "हाँ माँ, बाद में करता हूँ, अभी ससुराल में busy हूँ।"
मगर फिर ज़िंदगी करवट लेती है।
और वो करवट हमेशा खुशी वाली नहीं होती।
एक दिन जब किस्मत साथ नहीं देती, जब शरीर साथ नहीं देता, जब आप अस्पताल के सफेद बिस्तर पर लेटे होते हैं, नलियां लगी होती हैं, आँखें दरवाजा देख रही होती हैं...
तब वो सास-साली, जिनको आपने हर खास मौके पर आगे रखा था, वो फोन पर सिर्फ इतना पूछ कर रह जाते हैं - "तबीयत कैसी है? ध्यान रखना।"
कोई मजबूरी बता देगा, कोई काम का बहाना। और ये गलत भी नहीं है, आखिर उनका खून का रिश्ता नहीं है आपसे।
लेकिन तब दरवाजा खोल कर जो भागते हुए अंदर आते हैं...
बिना चप्पल पहने माँ, आँखों में आंसू लिए बाप, ऑफिस से छुट्टी लेकर आया भाई, और ससुराल से लड़-झगड़ कर भी तुम्हारे पास बैठी बहन।
वो डॉक्टर से पूछ रहे होते हैं - "साहब, कितना भी खर्चा हो जाए, मेरे भाई को ठीक कर दीजिए।"
वो माँ भगवान के सामने गिड़गिड़ा रही होती है - "मेरी उम्र भी मेरे बच्चे को दे दो।"
उस दिन समझ आता है कि...
चमकने वाले रिश्ते और टिकने वाले रिश्ते में बहुत फर्क होता है।
ससुराल का रिश्ता इज्जत का रिश्ता है, उसे निभाना भी धर्म है। उनकी इज्जत करो, उनका सम्मान करो। पर ये कभी मत भूलो कि इज्जत के रिश्ते से बड़ा होता है खून का रिश्ता।
साली-सास को आगे रखना गलत नहीं है, पर माँ-बाप, भाई-बहन को पीछे धकेल देना सबसे बड़ा गलत है।
याद रखो -
खुशी में शामिल होने वाले बहुत मिलेंगे,
पर दुख में निस्वार्थ खड़े होने वाले सिर्फ माँ-बाप और भाई-बहन ही होंगे।
इसलिए संतुलन बनाओ। नए रिश्तों को दिल से अपनाओ, पर पुराने रिश्तों की जड़ें कभी मत काटो। क्योंकि जब तूफान आएगा, तो सजावटी पौधे नहीं, गहरी जड़ों वाले पेड़ ही तुम्हें बचाएंगे।
